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Home >> New Hindi Kahani | मंदबुद्धि राजा की कहानी
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New Hindi Kahani | मंदबुद्धि राजा की कहानी

By Shivam KasyapMarch 7, 2023No Comments6 Mins Read
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New Hindi Kahani घोड़ा बनेगा रक्षामंत्री 

कश्मीर के एक भाग में मंदबुद्धि नाम का एक राजा राज्य करता था। राजा सुन्दर, सुशिक्षित और कुलीन था, पर बुद्धि में सचमुच तेज नहीं था।  शायद इसी कारण उसका नाम मंदबुद्धि था। 

मंदबुद्धि के पास एक काले रंग का घोड़ा था। वह इसी घोड़े पर सवार होकर जंगलों में शिकार खेलने जाता। ऊँची-ऊँची पहाड़ियों पर घुड़सवारी करता और समय आने पर लड़ाइयाँ लड़ने भी इसी घोड़े पर जाया करता था। 

राजा ने घोड़े  की देखभाल के लिए दर्जनों नौकर-चाकर रखे थे। वे घोड़े को नहलाते, मालिश करते।  कई नौकर उसको खाना खिलाते, तो कई उसके लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के चारे का प्रबंध करते।  काला घोड़ा देखने में बहुत सुन्दर, स्वस्थ, चमकदार और शक्तिशाली था। 

मंदबुद्धि के शासनकाल में राज्य का काम-काज अधिकतर मंत्रीगण ही चलाते थे।  एक बार पड़ोस के राजा हींगुमल ने मंदबुद्धि के राज्य पर हमला किया। सारे राज्य में खलबली मच गई। 

राजा मंदबुद्धि का रक्षामंत्री इस आक्रमण का मुकाबला करने के लिए बिल्कुल तैयार नहीं था। उसने राजा से कहा-“महाराज, मेरी तो यह राय है कि हम बिना किसी शर्त के राजा हींगुमल से सामने अपने हथियार डाल दें।”

-“नहीं, ऐसा कभी नहीं हो सकता।  अपने देश की सुरक्षा के लिए हमें हर हालत में लड़ना होगा।”

इसके तुरंत बाद राजा मंदबुद्धि ने अपनी सेना की बागडोर संभाली।  अपने काले घोड़े पर सवार होकर उसने अपनी सेना का नेतृत्वा किया। 

New Hindi Kahani

दुश्मन के सैनिकों को कुचलता हुआ, अपने काले घोड़े पर सवार होकर, उसने अपनी सेना में नया जोश भर दिया।  अपनी सेना के साथ-साथ बहादुरी से लड़ते हुए राजा मंदबुध्दि ने दुश्मन को वापस खदेड़ दिया। 

विजय का जश्न सारे राज्य में मनाया गया। 

मंदबुद्धि अपने रक्षामंत्री से बहुत ही रुष्ट था। अपने रक्षामंत्री को बुलाया और कहा-“आज से देश के रक्षा मंत्रालय का सारा काम-काज मेरा काला घोड़ा ही चलाएगा।”

“ऐसा कैसे हो सकता है ?” -रक्षामंत्री आश्चर्य से बोला। 

यह सुनते ही मंदबुद्धि उस पर बरस पड़ा। कहा-“क्यों, नहीं हो सकता ? तुमने तो मुझे हिंगुमाल के सामने बिना किसी शर्त के हथियार डालने की सलाह दी थी, तब मेरा काला घोड़ा दुश्मन से टक्कर लेने के लिए आगे बढ़ा था। “

“पर महाराज, आपका घोड़ा बोल नहीं सकता।  वह मंत्रालय की देख-रेख का काम कैसे कर सकता है ? वह सभासदों को कैसे सम्बोधित कर सकता है ?” -रक्षामंत्री ने राजा को समझाते हुए कहा। 

“सब कुछ हो सकता है।  मेरे पास इसका भी समाधान है। “

राजा ने अपनी बात समझाते हुए कहा। 

-“महाराज के पास इस समस्या का क्या समाधान है ?”

“घोड़े को बोलना सिखा दो।” -मंदबुद्धि ने सुझाया।  

“पर कैसे ? रक्षामंत्री ने पूछा। 

“इस बारे में मुझे शिक्षामंत्री से बात करनी है।” -मंदबुद्धि बोला। 

 अगले ही पल राजा ने शिक्षामंत्री टिंचूमल को दरबार में बुलवाया।  कहा-“मैंने निश्चय किया है कि काले घोड़े को अपना रक्षामंत्री बनाऊँ।  इसके लिए तुम्हें उसे बोलना सीखना होगा।”

“पर राजन, यह कैसे होगा ? घोड़ा कैसे बोलना सीखेगा ?”

टिंचूमल चकित होकर बोला। 

“यह तो तुम्हें हर हालत में करना होगा। यदि तुम ऐसा नहीं करोगे, तो तुम्हें सपरिवार देश से निकाल बाहर किया जाएगा।  तुम तीन दिन के अंदर-अंदर मुझे अपना फैसला सुनाओ।” -राजा ने गुस्से से कहा। 

टिंचूमल से कुछ उत्तर नहीं बना।  वह बहुत चिंतित हुआ। यही सोचता रहा-‘घोड़े को कैसे बोलना सिखाऊं ?’-इसी विचार में डूबा हुआ वह घर पहुंचा।

टिंचूमल की पत्नी बहुत बुद्धिमान और होशियार थी। अपने पति को उदास देख, बोली-“आज तुम बहुत उदास लग रहे हो।  सब ठीक-ठाक तो है ?”

“आज महाराज ने मुझे एक बड़ी समस्या में उलझा दिया है।”-कहते हुए टिंचूमल ने पत्नी को सारी बात बता दी। 

पति की बात सुनकर वह बोली-“बस, इतनी-सी बात ! तुम्हारी समस्या इतनी जटिल नहीं है कि जिसका कोई समाधान ही न हो।  मुझे इसका हल कुछ-कुछ मिल गया है।” कहकर उसने पति को सारी बात समझा दी। 

तीन दिन बाद मंदबुद्धि ने टिंचूमल को बुलावा भेजा।  

उस दिन टिंचूमल बहुत खुश था।  “महाराज की जय हो।”-कहकर वह दरबार में हाजिर हुआ। 

उसको देखते ही राजा ने पूछा-“तुमने क्या सोचा ?”

“महाराज, मुझे आपके काले घोड़े को बोलना सिखाना मंजूर है।”-टिंचूमल ने बड़े विश्वास के साथ कहा। 

अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए टिंचूमल बोला-“महाराज, वैसे तो यह काम अत्यंत कठिन है, लेकिन आपकी इच्छा तो पूरी करनी ही होगी। हाँ, इसमें बहुत पैसा और समय लगेगा।”

यह सोचकर कि घोड़ा बोलना सीख, रक्षामंत्री बनेगा, राजा मंदबुद्धि मन ही मन बहुत प्रसन्न हुआ। उसने टिंचूमल से पूछा-“मेरा कला घोड़ा कितनी देर में बोलना सीख सकेगा ?”

“यही कोई पाँच साल में।” टिंचूमल ने उत्तर दिया -“और महाराज, इसके लिए आपको अपना काला घोड़ा मेरे पास छोड़ना पड़ेगा।  पर उसके पालन-पोषण की जिम्मेदारी राज्य की ही होगी।”

“मुझे यह सब मंजूर है।”-राजा बोला। 

सारे राज्य में यह समाचार आग की भाँति फ़ैल गया, राजा अपने काले घोड़े को रक्षामंत्री बनाने जा रहा है।  चारों ओर इस बात की चर्चा थी कि शिक्षामंत्री टिंचूमल ने राजा के काले घोड़े को बोलना सिखाने की जिम्मेदारी ली है। 

राजा के इस फैसले से घोड़े का जीवन स्तर बहुत ऊँचा हो गया। देखते-देखते घोड़ों की कीमतें आसमान छूने लगीं। घोड़े पालने वालों की मौज हो गई। 

कई लोगों ने यह सोचकर घोड़े ख़रीदे कि कल को वे भी मंत्री बन सकते हैं। दिन-प्रतिदिन घोड़ों का सम्मान बढ़ता ही गया। अब तो कोई भी घोड़ों से बोझा ढोने का काम न कराता।  घोड़ों को घुड़सवारी और खेलों में भाग लेने जैसे कामों से भी छुट्टी मिल गई। 

राजा ने अपने रक्षामंत्री को आदेश दिया कि वह सेना में भी घोड़ों का विशेष ध्यान रखे।  उनके पालन-पोषण में किसी तरह से कोई कमी न आने पाए। 

इसी आदेश के अनुसार रक्षामंत्री ने सेना से घोड़ों को हटाकर गधों को लगा दिया।   सारे राज्य में घोड़ों की मस्ती हो गई।  वे हट्टे-कट्टे और आराम पसंद बन गए। 

इस बात की सूचना पड़ोस के राज्यों में भी फ़ैल गई।  राज्य हिंगुमल ने अपने मंत्रियों की सभा बुलाई।  सभा में निर्णय किया गया कि राजा मंदबुद्धि से पिछली हार का बदला लेने का यह सुनहरा अवसर है। 

राजा हिंगुमल ने फिर एक बार मंदबुद्धि पर धावा बोल दिया। इस बार मंदबुद्धि की गधों पर लड़ने वाली सेना हिंगुमल के तेज घुड़सवारों के सामने नहीं टिक सकी।  स्वयं राजा के पास उसका काला घोड़ा नहीं था। 

इस बार राजा की न केवल करारी हार हुई, बल्कि मंदबुद्धि अपने सैनिकों के साथ लड़ाई में मारा गया। 

एक सनकी राजा ने अपनी सनक के कारण पुरे राज्य को नष्ट कर दिया। 

The End – New Hindi Kahani

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