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कहानियाँ

Hindi Best Story हिन्दी कहानियाँ

By Shivam KasyapDecember 21, 2021No Comments7 Mins Read
Hindi Best Story
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Hindi Best Story ज्ञान से भरी कहानियाँ 

 

समदर्शी भगवान के जात नहीं 

आखेट की खोज में भटकता विश्वबन्धु शवर नील पर्वत  की एक गुफा में जा पहुँचा। वहाँ भगवान नील-माधव की मूर्ति के दर्शन पाते ही शवर के दृदय में भक्ति भावना का स्त्रोत उमड़ पड़ा। वह हिंसा छोड़ कर भगवान् नील की रात-दिन पूजा करने लगा। 

उन्हीं दिनों मालवराज इंद्रप्रधुम्न किसी अपरिचित तीर्थ में मंदिर बनवाना चाहते थे। उन्होंने स्थान की खोज के लिए अपने मंत्री विद्यापति को भेजा।  विद्यापति ने वापस जाकर राजा को नील पर्वत पर शवर विश्वबंधु द्वारा पूजित भगवान् नील-माधव की मूर्ति की सूचना दी। राजा तुरंत मंदिर बनवाने के लिए चल दिया। 

विद्यापति राजा इन्द्रप्रधुम्न को उक्त गुफा के पास लाया, किन्तु आश्चर्य मूर्ति वहां नहीं थी। राजा ने क्रोधित होकर कहा-“विद्यापति तुमने व्यर्थ ही कष्ट दिया है। यहाँ तो मूर्ति नहीं है।”

विद्यापति ने कहा-“महाराज !  मैंने अपनी आँखों से इसी गुफा में भगवान नील-माधव की मूर्ति अंतर्धान हो गई है। राजन ! आते समय आप क्या भावना करते आए हैं ?” राजा इंद्रप्रधुम्न ने बताया कि मैं केवल इतना ही सोचता आया हूँ कि अपने स्पर्श से भगवान की मूर्ति को अपवित्र करने वाले शवर को सबसे पहले भगा दूंगा और कोई अच्छा पुजारी नियुक्त कर दूंगा और तब मंदिर बनवाने का आयोजन करूँगा।  विद्यापति ने बड़ी नम्रता से कहा कि आपकी इसी भेद भावना के कारण भगवान रुष्ट होकर चले गए हैं। समदर्शी भगवान् जात-पात नहीं, हृदय की सच्ची निष्ठा ही देखते हैं। 

राजा ने अपनी भूल सुधारी।  भगवान से क्षमा माँगी, उनकी स्तुति की। उसी स्थान पर जगन्नाथ जी के प्रसिद्द मंदिर की स्थापना कराई।”

 

चमत्कारी बोलती टोपी 

एक गरीब किसान अपनी बीमार माँ  के साथ रहता था। उसका नाम तोरोकु था। तोरोकु दिन भर खेत पर काम करता। फिर भी अपने और बीमार माँ के लिए खाना न जुटा पाता था। इसलिए वह दूसरों के खेत में भी मजदूरी करता और लोगों का बोझा ढोता। 

एक दिन बहुत तूफान तथा बारिश आने की आशंका थी। उसी दिन तोरोकु को अपने गांव के बढ़ई के से दूसरे गांव के मुखिया के यहाँ एक बक्सा पहुंचाना था। मुखिया की बेटी की शादी थी।  वह बक्सा उसी के लिए बनवाया गया था। 

तोरोकु को बीमार माँ ने ऐसे मौसम में घर से बाहर जाने से मना किया, लेकिन उसने एक न मानी। उसकी जिद देखकर माँ ने उसे एक पुरानी टोपी निकालकर देते हुए कहा-“बेटा, यह तुम्हारे पिताजी की एकमात्र निशानी है। इसे पहनकर जाओ।  शायद यह इस तूफान और बरसात में तुम्हारी मदद कर सके।”

तोरोकु ने उस टोपी को पहना और बक्से को पीठ पर लादकर चल दिया। रास्ते में उसे थोड़ी थकान महसूस हुई। बक्से को पीठ से उतार, वह एक पेड़ के नीचे सुस्ताने लगा। अचानक उसे किसी की बातें करने की आवाज सुनाई देने लगी। 

“ये आवाजें कहाँ से आ रही हैं ? कोई दिखता क्यों नहीं ?”-

उसने चिल्लाकर कहा और झुंझलाहट  में अपनी टोपी सिर से उतार दी। 

अब उसे बातें सुनाई देना बंद हो गई। थोड़ी देर बाद जब तोरोकु ने फिर से टोपी पहनी, तो उसे बातें फिर सुनाई देने लगीं। 

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‘कमाल है, टोपी पहनते ही मैं चिड़ियों, पेड़ों, नदी-पहाड़ों की बातें सुन सकता हूँ और समझ भी सकता हूँ।’ -सोचते हुए वह बक्सा पीठ पर लादकर मुखिया के गांव की ओर चल पड़ा। 

“देखा न, तोरोकु जिस लड़की का बक्सा पहुँचाने जा रहा है, वह बहुत दिनों से बीमार है।  उसका पिता बहुत चिंतित है। उसके ब्याह की तारीख भी नजदीक आ रही है। बहुत इलाज कराने के बाद भी उसकी हालत दिन पर दिन बिगड़ती ही जा रही है।”-एक चिड़िया बोली। 

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तोरोकु धीमी गति से चलता ध्यान से चिड़ियों की बातें सुनने लगा। 

“हाँ, लेकिन मुखिया के बगीचे में एक कपूर का पेड़ है। लड़की को ठीक करने का इलाज इस कपूर के पेड़ के पास है। लेकिन पेड़ों की बातें भला मनुष्य कहाँ समझ पायेंगे ?”-दूसरी चिड़िया ने कहा। 

यह सुनकर तोरोकु के मुँह से निकला-“मैं, मैं समझूंगा।”

लेकिन काश, चिड़ियां  तोरोकु के उत्साह को समझ सकतीं। उन्हें न तो मनुष्य की भाषा आती थी और न ही उनके पास तोरोकु जैसी चमत्कारी टोपी थी। इस तरह तोरोकु नदी, पहाड़, पेड़, चिड़ियों की बातें सुनता,मस्ती से मुखिया के घर पहुंचा। तोरोकु ने मुखिया को बताया कि अगर वह उसे एक दिन अपने घर ठहरने की इजाजत दे, तो वह उसकी बेटी की बीमारी दूर कर सकता है। 

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तोरोकु मुखिया के घर ठहरा और रात होने का बेताबी से इंतजार करने लगा। आखिर रात को ही तो वह पेड़ों की बातें सुन सकता था। लोगों का ऐसा मानना था कि आधी रात में ही पेड़ आपस में बातें करते हैं। तोरोकु पीछे के बगीचे में कपूर के पेड़ के पास जाकर अपनी टोपी पहनकर चुपचाप बैठ गया। कुछ देर बाद उसे लगा कि  पेड़ आपस में बातें कर रहे हैं। एक पेड़ बोला-“देखो, हमारा दोस्त कपूर का पेड़ अब थोड़े ही दिनों में मर जाएगा।”

दूसरा बोला-“बेचारा दिन प्रतिदिन सूखता जा रहा है।”

“जब से मुखिया ने पीछे की पहाड़ी पर बड़ा-सा पत्थर लगाकर पानी को रोका है, तब से ही यह हुआ है।”-तीसरा बोला। 

चौथा पेड़ तो इतनी देर से चुपचाप सबकी बातें सुन रहा था, बोला-“अरे, मुखिया बहुत धूर्त है। उसने सारा पानी धान के खेत में डाल दिया है।”

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“वह मुर्ख यह नहीं जानता कि कपूर के पेड़ के सूखने की वजह से ही उसकी बेटी बीमार है।”-पाँचवां बोला। 

“हाँ, एक दिन कपूर के पेड़ की तरह हम भी सूखकर मर जायेंगे। लेकिन हमारी कोई नहीं सुनेगा। कौन करेगा हमारी देखभाल ?”-उनमें से एक बुजुर्ग पेड़ भारी स्वर में गहरी साँसे लेते हुए बोला। 

तोरोकु जो इतनी देर से पेड़ों की बातें सुन रहा था, तुरन्त बोल पड़ा-“मैं करूँगा, मैं करूँगा तुम लोगों की देखभाल।”

सुबह की लालिमा पूरब की पहाड़ी से छिटकने लगी थी।  तोरोकुउठकर पेड़ों की बताई गई पहाड़ी की तरफ चल पड़ा। वहाँ जाकर उसने देखा कि सचमुच वहाँ पर एक बड़ा-सा पत्थर पानी को बगीचे में जाने से रोक रहा था। तोरोकु पत्थर हटाने की कोशिश करने लगा। लेकिन पत्थर इतना बड़ा था कि हिलने का नाम तक न लिया। तोरोकु अपनी ओर से पूरा जोर लगाकर पत्थर को हटाने की कोशिश करता रहा। 

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इसी बीच मुखिया उसे ढूंढ़ते-ढूंढते  वहाँ आ पहुँचा। तोरोकु को पत्थर हटाते देख, वह गुस्से से बोला-“अबे मुर्ख, यह क्या कर रहा है ? इससे मेरे सारे खेत सुख जायेंगे।” यह कहकर वह तोरोकु को वहाँ से हटाने लगा,परन्तु तोरोकु कहाँ मानने वाला था ? जिद्दी तो वह था ही।  उसने पूरा जोर लगाया और पत्थर दूसरी ओर ढलान से लुढ़कता हुआ दूर जा गिरा। बगीचे की तरफ पानी बहने लगा। पानी का बहाव इतना तेज था कि मुखिया, उसके साथ बगीचे तक बहता चला गया।  मुखिया को काफी चोट आई। 

कुछ ही दिनों में कपूर का पेड़ लहलहाने लगा और उसके साथ के पेड़ भी हरे-भरे हो गए। कपूर के पेड़ की खुशबू वातावरण में दूर-दूर तक फैलने लगी। मुखिया की बेटी भी ठीक हो गई। तोरोकु एक दिन अपनी माँ को घुमाते हुए वहाँ ले आया।  हरियाली देखकर तोरोकु की माँ भी स्वस्थ होने लगी। 

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मुखिया को इस बात की काफी ख़ुशी थी कि तोरोकु की वजह से उसकी बेटी स्वस्थ होकर अपने ससुराल जा चुकी थी। वह समझ चुका था कि पानी की जरुरत केवल फसल को ही नहीं, बल्कि अन्य पेड़-पौधों को भी है। तोरोकु को उसने ढेर सारे रूपए इनाम में दिए। अब तोरोकु को न दूसरों के खेत पर काम करने की जरुरत थी और न ही बोझा ढोने की। उसने अपने लिए खेत ख़रीदे। ढेर सारे पेड़ लगाए। तोरोकु अब दिनभर अपने खेत में काम करता। जब थक जाता तो पेड़ों की छाया में अपने पिता की चमत्कारी बोलती टोपी पहन, पेड़ों की, चिड़ियों की, नदी-नालों की बातें सुनता। कहते हैं, तोरोकु के गांव में फिर कभी पानी की कमी नहीं हुई। 

चूँकि इस कहानी का नाम तो चमत्कारी बोलती टोपी है लेकिन वास्तव में यहाँ कहानी हमें बहुत कुछ सिखाती है। इंसान को कभी भी अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को नहीं सताना चाहिए। और यह कहानी हमें  प्रकृति से प्यार करना सिखाती है। आशा करते है आपको ये कहानी पसंद आयी होगी।  आपको ये कहानी कैसी लगी कमेंट के माध्यम से हमें जरूर बतायें धन्यवाद !

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